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गाँव- देहात में ठहरी एक बारात का आँखों देखा हाल

गाँव-देहात की या शहर की ही किसी बारात में शामिल होना यानि की अपने सिर में कौवे की कलगी लगाने जैसा है। लोगों ने एक आईटम खा कर खत्म किया नहीं कि कौवे की तरह घरातीयों की ओर ताकने लगेंगे कि देखें अब क्या आ रहा है। महक तो बहुत बढिया आ रही है, पर साले कर क्या रहे हैं…….ला क्यों नहीं रहे। ये उस बारात का हाल होता है जो गाँव देहात में खेतों में उस समय ठहराई जाती है जब गेहूँ कट चुके हों, अरहर वगैरह ढो सटक कर एक लाईन कर दिये गये हों। ऐसे मे बिना हॉल वगैरह बुक किये केवल शामियाना तान कर बारात ठहरा दी जाती है। जिसका अपना अलग ही आनंद है।

ऐसी ही एक बारात में मैं अबकी शामिल हुआ। बहुत मन से इस बारात में गया था क्योंकि तीन चार साल बाद कोई बारात करने का मौका मिला था वरना तो कभी गर्मियों में शादि व्याह के मौसम में मेरा जाना कम ही हो पाता है । थोडा जल्दी ही मैं चल पडा। गाँव देहात का रास्ता है जाने कैसा रास्ता हो। मोटर साईकिल थी ही । रास्ते में कल्लू धोबी की दुकान पर भीड देखा। लोग बीच बाजार बनियान पहने, खडे खडे शर्ट उतार कर प्रेस करवा रहे थे । उनका मानना था कि बारात में जा रहे हैं तो एकदम कडक इस्त्री किये हुए जाना चाहिये। इसके लिये लोगों में बीच बाजार अधनंगे खडे होने में भी कोई हिचक नहीं थी। कुछ लोग नाई की दुकान पर जमें थे। खत को इतना सफाचट करवाना चाहते थे मानों वहाँ कभी बाल ही नहीं थे। सब को जैसे आज ही चंदन टीका लगा कर केंचुली छोडना था।

ईधर मोटर साईकिल पर बैठते ही साथी ने इतनी जोर की किक मारी की लगा एक और किक मारे तो बस सीधे द्वारपूजा पर पहुँच जाउंगा। थोडी दूर सडक पर चलते ही बडी बडी गिट्टियों से सामना हुआ, मोटरसाईकिल तो ऐसे छिटक रही थी जैसे जमीन पर कुछ ढूँढ रही हो।
हम लोग रास्ता बदल कर चले। काफी आगे जाने पर एक जन से रास्ता पूछे तो बोले आपको उसी गिट्टी वाली सडक से जाना चाहिये था…..बहरहाल रास्ता तो आगे ठीक था। उसका ‘बहरहाल’ वाला शब्द कानों में गूँजने लगा। ये साला ‘बहरहाल’ क्या होता है ?



किसी तरह बचते बचाते लडकी वालों के घर के पास बारात स्थल पहुँचा। काफी जल्दी पहुँच गाया था। सात-साढे सात बजे होंगे। गाने बजाने की आवाज से पता चल गया था कि हाँ यही घर है जिसके यहाँ शादी पडी है। अन्य बाराती आते होंगे। अक्सर गाँवों में बारात के रूकने की जगह लडकी के घर से सौ सवा सौ मीटर दूर ठीक की जाती है जहाँ से चलकर बारात द्वारपूजा वगैरह के लिये गाते बजाते आती है। तो, मैं और मेरे मित्र वहीं मोटर साईकिल से उतर गये। एक नीम का पेड था। उसके नीचे कुछ टेंन्ट हाउस वाली फोल्डिंग खाटें पडी थीं। उन्हीं पर हम लोग जा बैठे। जा क्या बैठे, बस यूँ समझिये कि उन खाटों पर पसर गये। आँखें उपर आसमान की ओर लगीं थी। हल्की हल्की हवा भी चलने लगी। नीम की कुछ झुकी हुई टहनियों देखते समय पता लगा आज तो अँजोरिया रात है। चाँदनी रात। नजर घुमाई तो देखा चाँद भी निकल ही रहा था। नीम की पत्तियाँ कुछ और नरम लगने लगीं।

तभी बगल के घर से किसी बुढिया की आवाज आई जो अपनी पतोह को डाँट रही थी –

- तुझे क्या जरूरत थी सिलबट्टा उठाकर बियाह वाले घर देने की। कह नहीं सकती थी कि अम्मा का फोडा पका है उस पर पीस कर नींम की पाती लगानी है। बस , उन लोगों ने पूछ लिया और इसने उठा कर दे दिया। बाहर वाले आयें, चाहे घर ही लूटकर चल दें, मजाल है जो इस घर के लोग मना कर दें।

गाँव देहात में अक्सर शादी-ब्याह के समय चीजें आपस में बाँट कर एक दूसरे को ले देकर काम चलाया जाता है। चूँकि बगल में ही शादी पडी थी तो सिलबट्टे वगैरह का काम निकल आया होगा, और लडकी वालो ने इस बुढिया के सिलबट्टे को उधार ले गये होंगे। लेकिन अब बुढिया है कि पतोह की जान खा रही है।

खैर, यही सब देखते सुनते नींद सी आने लगी। अभी बाकी बारात पहुँची नहीं थी। तब तक कुछ लोग आये बाल्टी में बेल का शरबत लेकर। उनके आग्रह करने पर कि बाकी जब बाराती आयेंगे तो वो भी पी लेंगे आप लोग पहुँच गये हैं तो लिजिये पी लिजिये। बेल का शरबत पीकर तृप्त हुआ। धीरे धीरे बाराती लोग जमा होने लगे। इलेक्ट्रानिक रथ वगैरह तैयार होकर जगमग जगमग दिखने लगा। उसके आगे आगे बीस बाईस लोग सिर पर गमला लाईट आदि लेकर चलने लगे। देखते ही देखते बारात द्वारपूजा के लिये निकल पडी।
डीजे खूब जमकर बज रहा था । कोई गुड्डू रंगीला फंगीला गा रहा था - थोडा सा ढील ढीला करो…..ऐसा ही कुछ। लोग डीजे पर जमकर नाच रहे थे। मैं ऐसे मौकों पर अक्सर ठूँठ हो जाता हूँ। समझ ही नहीं आता कि नाचूँ कि न नाचूँ। और कोई जगह होती तो नाच भी लेता लेकिन गाँव देहात में नहीं । इसके पीछे एक वैज्ञानिक कारण है जो कि गाँव देहात में रहने वाले ही जानते हैं। दरअसल होता यह है कि, गाँवों में गाय भैंसों को तो खिला पिलाकर शाम को ही हटा दिया जाता है ताकि बारात के लिये रास्ता बने लेकिन खूँटा वहीं गडा रहने दिया जाता है । अब एक दिन के लिये खूँटा कौन उखाडे-पखाडे। सो जो डीजे शहर के लोगों को नचा रहा होता है वही डीजे गाँव के लोगों को लहूलूहान करवा रहा होता है। लोगों का आधा ध्यान नाचने में और आधा ध्यान खूँटा ढूँढने में होता है कि कहीं लग न जाय।

मैंने देखा कि डीजे अब भी बज रहा था। सिर पर रखे लाईटें लिये लोग आगे बढ रहे थे कि तभी एक मुसीबत आन पडी। बाँस की कईन / टहनी कई जगह पर इन लाईटों में उलझ रहीं थी। अब या तो बाँस की इन कईनियों को काटा जाय या लाईटों को वहीं रोक दिया जाय। लेकिन लोगों ने जज्बा दिखाया, बँसवारी के हर बाँस को दो दो लोग पकड कर एक ओर दाबे रखे ताकि कईन लाइटों से न टकराये और देखते ही देखते पूरा रथ बिना रोकटोक आगे बढ लिया। डीजे अब भी गा रहा था थोडा सा ढील ढीला करो।

लोग नाच भी खूब रहे थे। कोई कोई तो नाचने में इतनी मेहनत कर रहा था, पसीने-पसीने हो रहा था कि लगता था जैसे उसे कोई मंडवे में से देख रहा है और उसका नाचना देखकर आज ही उसकी शादी भी फिक्स हो जायेगी। एकाध जन तो गमछा लेकर नचनिया बनने में ही परम आनंद प्राप्त कर रहे थे। कुछ पियक्कड जाँबाज लोगों को तो लगता था अब नहीं नाचेंगे तो बारात मालिक अगली खुराक में कमी कर देगा।
जैसे तैसे द्वार पूजा का कार्यक्रम संपन्न हुआ। मिठाई और जलपान आदि के लिये बारात को शामियाने में नॉयलॉन वाली फोल्डिंग खाटों, कुर्सियों आदि पर बिठाया गया जो गेहूँ के खाली खेत में बिछे थे। बगल के खेत में अरहर की कटी हुई खूँटिया जमीन से दो-तीन इंच निकली हुई कह रहीं थी जरा उधर ही रहना गेहूँ वाले खेत में, इधर आये तो बस गड जाउंगी। (शर्म से नहीं ).

खैर, थोडा इंतजार करके कुछ लोगों के जलपान करके चले जाने के बाद अगली खेप में मैं भी एक कुर्सी पर बैठ गया। लेकिन बैठते ही पता चल गया कि पैंट के नीचे छेना मिठाई की चाशनी लग गई है जो कि कुर्सी पर गिरी थी/ गिरा दी गई थी। मन मसोस कर थोडा पानी ले साफ सूफ किया ही था कि मित्र बोले - यार मेरा भी लगता है पैंट चाशनीया गया है :)
मैंने कहा लो मजा अब। ले- देकर किसी तरह पानी से चाशनी लगी जगह को किसी तरह धोया । धोया क्या बस धोने का छलावा भर किया।


इतने में कई लोगों को लघु शंका की सूझी तो बढ लिये कटे अरहर के खेत की तरफ। जमकर खेत को नम किये। सुबह जब खेत मालिक अपने खेतों को देखेगा तो जरूर सोचेगा, चलो इसी बहाने खाद-पानी का खर्चा बच गया । अभी ये सब क्रिया कलाप चल ही रहा था कि किसी के नाराज होने की खबर आई। ये नाराज होना भी एक परंपरा बन गई है। जिस शादी में कोई नाराज न हुआ तो समझो कि शादी का कोई मजा नहीं आया। कोई जीजा इसलिये नाराज है कि उसकी ओर कोई ध्यान नहीं दे रहा तो कोई इसलिये क्योंकि किसी घराती ने गलती से पानी भरी बाल्टी पैर पर दे मारी। ये लोग इस आन्हर गाँव में जाने क्यों रिश्ता करने आ गये। एक बाल्टी के पैर में हल्के से लग जाने से पूरा गाँव ही अंधा कैसे हो जाता है ये बारात में आकर बखूबी समझा जा सकता है।

धीरे-धीरे खाने का समय भी हो आया। लोग अब पंगत में बैठना अपमान समझने लगे हैं। टेबल कुर्सी की पांत चलेगी। समझदार बाराती कभी ट्यूबलाईट के आसपास वाली सीट पर बैठ कर भोजन नहीं करता। वो अंधेरा कोना तलाशता है क्योंकि गाव देहात में कीट पतंगे ट्यूबलाईट के आस पास ही बिना डीजे की धुन बजाये ही नाचते रहते हैं और जो ट्यूबलाईट के पास बैठा हो उसकी थाली में जरूर गिर कर खुशी मनाते हैं। अंधेरे कोने में बैठने का एक फायदा यह भी होता है कि निस्संकोच होकर भोजन गपागप भकोसा जा सकता है।
एक बात मैंने नोटिस की है कि जब परोसने वाला आता है तो लोग उससे बडे आग्रह से कहेंगे कि - 'उनको भी' दो....इस 'उनको भी'... में 'भी' बडे काम का होता है जिसका छुपा मतलब है कि उनके साथ साथ 'मुझे भी' भोजन परोसो ।
खैर भोजन आदि करने के बाद जो लोग आस पास के थे या जिनके पास आने जाने का निजी वाहन था वो धीरे-धीरे चलने लगे। एक के बाद एक मोटर साईकिलों की आवाज जब आने लगी तो गाँव के कुत्ते तक हदस गये कि जाने कौन लोग हैं जो हडर-हडर किये हुए हैं। उन बारातियों के जाने के बाद कुत्तों में भी एक तरह के इत्मीनान की झलक दिखाई दे रही थी कि जितने चले जांय उतना अच्छा। शायद नाहक ही मोटर साईकिल की लाईट जला जला कर कुत्तों की विश्रांति में खलल पड रही थी। एक कुत्ते को तो देखा, अपने लिये सोने की जगह तलाश रहा था। लेकिन कहाँ जाय, उसके सोने की जगह पर तो शामियाना तना है और लोग हैं कि शामियाना छोडकर बाहर चाँदनी रात में खाट बिछाकर पडे हैं। मजबूर होकर कुत्ते ने शामियाने में ही सोना ठीक समझा।
मैंने चाँदनी रात में खेतों में बिछी खाट का आनंद लेने की सोची। खाट पर पडते ही नींद सी आने लगी। आस पास लोग अब भी भुनुर - भुनुर बातें कर रहे थे। कोई कुछ कहता तो कोई कुछ। एक जन का कहना था सब्जी कुछ कम जम रही थी तो एक को तो दाल में नमक तेज । मैंने सिर घुमा कर उन लोगों की ओर देखा तो पाया कि ये वही लोग थे जो कडक और बिना सिलवट पडे इस्त्री वाले कपडे पहनने के लिये बीच बाजार कल्लू की दुकान पर शर्ट उतार कर खडे थे ताकि ताजा ताजा शर्ट प्रेस हो और बिना सलवट वाली शर्ट पहने बारात में चमक सकें।
मैं सोच रहा हूँ, जो लोग खुद बाजार में अपने कपडे उतार कर खडे थे उनसे किसी की इज्जत के बारे में उम्मीद रखना भी बेमानी है । उनींदी आँखों से न जाने क्या क्या मैं सोचता जा रहा था, एक बेटी मेरी भी है । आज नहीं तो कल मेरे घर भी यही लोग आयेंगे। बारात होगी, गाजे बाजे होंगे, शोर-शराबा होगा, तमाम नाते रिश्तेदार जुटेंगे, तमाम तरह के खर्चे होंगे औऱ होंगे ऐसे ही कपड उतारू लोग ।
मेरी आँखें नींद से बोझल हो रहीं थी। चाँदनी रात में, खुले आसमान के नीचे, खेत में मैं सोने की कोशिश कर रहा था कि तभी आसमान से चाँद ने झुक कर मेरे माथे से कुछ उठाया और कहा - उफ्फ.... ये शिकन अभी से क्यों ला रहे हो, बिटिया तो अभी छोटी है न :)

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