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अब चूके तो सब हारे!


एक बड़े बदलाव के मुहाने पर खड़ा बिहार, आज अपने गर्भ में कई सवालों के साथ राज्य के लोगों से नजरें मिलाने के लिए तैयार है. पूछता है बिहार अपने राज्य के निवासियों से- अगली सरकार चुन तो रहे हो, जानते हो क्या चाहते हो? जानते हो भविष्य को निर्धारित करने की जिम्मेदारी किन कंधों पर डाल रहे हो? क्या तुम्हारा चुनाव सही है? ठोक बजाकर देख लिया क्या? लॉक तो कर दिया है, अफसोस तो नहीं करोगे?

इतना ही नहीं, बिहार आज ये भी जानना चाहता है कि अगर इन सभी सवालों और इनसे जुड़े तमाम पहलूओं की जानकारी है, तो क्या, आम बिहारी तैयार है? तैयार है अपने आप में एक ऐसा बदलाव करने के लिए जो उसकी मानसिकता, सोच, चाल-ढाल, आचरण, सामाजिक परिवेश, आर्थिक स्थिति और उससे भी ऊपर ‘बिहारी स्टेट ऑफ मांइड’ को हमेशा के लिए बदलने के लिए मजबूर करे? अगर नहीं, तो फिर विकास और सामाजिक उत्थान के सपने देखना हर बिहारी बंद कर दे.

20 तारीख को मतदान के आखिरी चरण के साथ ही लोगों ने अपने पांच साल के भविष्य को ईवीएम में बंद कर दिया. नेताओं की नींद फिलहाल उड़ी होगी, लेकिन तमाम सर्वेक्षणों के बाद, शायद ही किसी को कोई शक-शुबा हो कि अगली सरकार किसकी बनने वाली है.

जेडीयू और बीजेपी गठजोड़ ने बिहार में वो कर दिखाया, जिसे 1977 के बाद किसी भी सरकार ने करने की हिम्मत नहीं की. बिहार में सुरक्षा और सदभाव के महौल को बढ़ावा दिया और अपराध, माफिया एवं छुट-भइये गुडों से लोगों को महफूज रखा. सड़कें चलने लायक बनवायी और बाबूओं की भ्रष्ट निगाहों पर जरा सी नेक-नीयती का पर्दा चढ़ाया. केंद्र सरकार से मिलने वाले अनुदान को खर्च किया और लोगों को ये जतलाया कि जाति, प्रांत और क्षेत्रवाद से कहीं आगे है विकास की एकजुटता.

ये एहसास लोगों को कराया कि विकास होगा, तो पेट भरेगा. विकास होगा, तो बच्चे पढेंगे. विकास होगा, तो बात-बात पर घूस देने की जरुरत नहीं होगी. विकास होगा, तो नौकरियां मिलेगी. घर छोड़कर पंजाब, गुजरात, असम, बंगाल, दिल्ली और मुबई नहीं भागना होगा. विकास होगा, तो बेटी की शादी के लिए मोटी रकम दहेज के तौर पर शायद नहीं देना होगी. विकास होगा, तो एक बिहार होने पर गर्व होगा, शर्मिंदगी नहीं झेलनी पड़ेगी.

कहने को तो ये कोई बड़ी बात नहीं है. भारत के कई ऐसे प्रांत हैं, जहां ये सारी बातें सामान्य है, या यूं कहें कि बुनियादी हैं. लेकिन एक ऐसा प्रदेश जिसने सालों की गुरबत देखी है. जहां हर दूसरे घर का कोई ना कोई सदस्य पढ़ाई और नौकरी के लिए दूसरे राज्यों में चप्पल घिस रहा है, जहां दो जून खाना मिलना मुश्किल है. वहां, ये सब बहुत मायने रखता है.

ऐसे में जेडीयू-बीजेपी गठजोड़ पर अब बहुत बड़ी और चुनौतिपूर्ण जिम्मेदारी होगी. अब नीतिश कुमार और उनके साथियों को एक ऐसी सरकार अपनी जनता को देंनी होगी, जिसकी तलाश बिहार के निवासी 70 के दशक से कर रहे हैं. अब सिर्फ कहने का नहीं, करने का वक्त होगा.

ये कहना कि केंद्र पैसे नहीं देता और आर्थिक विकास के लिए धन की कमी हो रही है, नहीं चलेगा. ये कहना कि बिहार में निवेश के साधनों की कमी है और कारखानों को लगवाना नई सरकार के लिए मुश्किल है, नहीं चलेगा. ये दावा करना कि जातीय समीकरण में फेर-बदल कर देने से सामाजिक बदलाव हो जायेगा, नहीं चलेगा. वोट-बैंक की राजनीति को बढ़ावा देने वाली सरकारी योजनाओं के एलान मात्र से लोगों की उम्‍मीदों को पाट दिया जाये, नहीं चलेगा. गुंडों और मवालियों को जेल में भर कर कानून-व्यवस्था की दुहाई देने से लोगों का पेट, नहीं भरेगा. सड़कें बनवा देने मात्र से सड़कों पर गाडि़यां दौड़ें, मुंगेरी लाल के ऐसे हसीन सपनों से काम नहीं चलेगा. बाढ़ आने के बाद राहत के नाम पर करोड़ों खर्च करने की सरकारी मानसिकता, अब नहीं चलेगी. लड़कियों की पढाई को बढ़ावा देने के लिए साइकिल और मासिक भत्ता देने से ही काम नहीं चलेगा.

ये सब पिछले पांच सालों में लोगों की सोच को बदलने में भले ही कारगर रहा हो लेकिन अब नीतीश कुमार और उनके सहयोगियों को एक नये माडल की तलाश करनी होगी.

बिहार के पास उपजाऊ जमीन की कोई कमी नहीं है. साल में तीन फसल आराम से होती है. इस प्राकृतिक देन का नई सरकार को फायदा उठाना होगा. एग्रों इंडस्ट्री को बढ़ावा देना होगा. चीनी मिलों को एक बार फिर से शुरु करना होगा और उनके आस-पास तरक्की के रास्ते निकाले होगें. कारखानें राज्य में लगें, इसके लिए इंडस्ट्री को टैक्स रिबेट देना होगा, जैसा उत्तराखंड, हरियाणा और गुजरात ने किया है. इसके साथ ही बुनियादी सुविधाओं के लिए नये सिरे से काम करना होगा. बिजली उत्पादन पर ध्यान देना होगा और पेशतर कोशिशों के जरीये कम से कम हर दिन 18 धंटे बिजली मुहैया करानी होगी.

...औऱ इस सब से ज्यादा मुश्किल और जटिल काम नई सरकार को ये करना होगा कि वो लोगों की सोच को बदले. रूढ़ीवाद, परंपरावाद, सामाजिक पिछड़ेपन, महिलाओं पर अत्याचार और बेटियों को बोझ समझने वाली सोच को हमेशा के लिए मिटाना होगा. और हां सपने देखने से पहले हर बिहारी को ‘बिहारी स्टेट ऑफ माइड’ वाली मानसिकता को अपने दिमाग से हमेशा के लिए निकाल देना होगा. नहीं तो बिहार अपने सकरेपन से शायद ही बाहर निकल पाये.

बिहार के पास आज वो मौका है, जिससे हर चीज बदली जा सकती है. छवि, चाल-चरित्र, आचरण और सोच. ये एक ऐसा मौका है जिसके बाद कोई ये कहता नहीं पाया जायेगा कि ‘सिंगापुर में जब लालू प्रसाद यादव मुख्यमंत्री के तौर पर निवेश की तलाश में गये थे, तो दिल्ली में लोगों ने मजाक में कहा- लालू को सिंगापुर के प्रधानमंत्री ने कहा कि बिहार के पास इतनी प्राकृतिक संपत्ति है अगर आप बिहार हमें दे दें, तो हम 8 साल में बिहार को सिंगापुर देगें. पलटकर लालू ने सिंगापुर के प्रधानमंभी को कहा– आप 8 महीनें के लिए सिंगापुर हमें दे दीजिए– बिहार जैसा बना देंगे.’ इस भद्दे मजाक को सुनकर हर स्वाभिमानी बिहारी का खून खौल उठता था.

आज हर बिहारी के पास और बिहार की राजनीतिक पार्टियों के पास एक सुनहरा मौका है. एक सुनहरा मौका, जयप्रकाश नारायण की उन पंक्तियों को दोहराने का– ‘बिहार जो आज सोचता है, भारत उसे कल करता है’.

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Aap sabhi bhaiyo & bahno se anurodh hai ki aap sabhi uchit comment de............

jisse main apne blog ko aap sabo ke samne aur acchi tarah se prastut kar saku......

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