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दुख अपने और पराए की पहचान कराता है



दुख कहां से आता है? यह कोई नहीं बता सकता, क्योंकि दुख आने के असंख्य कारण है। दुख..., दर्द..., परेशानियां..., समस्याएं..., प्रॉब्लम्स इन शब्दों से आज कोई अछूता नहीं है। यह भी सच्चाई है कि सुख को जाने से रोका नहीं जा सकता और दुख को आने से। हर धर्म में सुख-दुख जीवन का मूल आधार बताए गए हैं। ये एक ही सिक्के के दो पहलु हैं।
सुख-दुख के संबंध में गोस्वामी तुलसीदास ने कहा है 'धीरज, धर्म, मित्र, अरु नारी, आपतकाल परखिए चारी।' यानी संकट के समय ही धीरज, धर्म, मित्र और नारी की परीक्षा होती है। सुख में तो सभी साथ देते हैं। सच्चा मित्र वही है जो अपने मित्र के दुख को देखकर दुखी होता है तथा उसके दुख दूर करने का हर तरह से प्रयास करता है। उसे हर तरह का सहयोग करता है। उसके अवगुणों को छिपाकर गुणों का बखान करता है।
कवि दुष्यंत कुमार ने एक कविता में कहा है- दुख को बहुत सहेज कर रखना पडा हमें, सुख तो किसी कपूर की टिकिया सा उड़ गया।
अर्थात् सुख कपूर की तरह है जो आग लगते ही तेजी से भभक कर जल उठता है और फिर बुझ जाता है। हालांकि उसकी स्मृति लंबे समय तक बनी रहती है।
देखा जाए तो दुख ही हमारे जीवन का सर्वश्रेष्ठ शिक्षक है। दुख ही हमें सही-गलत में फर्क सीखता है। जीवन की सच्चाई हमारे सामने लेकर आता है लेकिन हम उसे समझ नहीं पाते। जिस तरह हम सुख उत्साह के साथ अपनाते हैं उसी तरह दुख का भी प्रसन्नता से स्वागत किया जाना चाहिए। हां, यह काम मुश्किल जरूर है, लेकिन असंभव नहीं। हमारी मानसिकता बन चुकी है कि हम सिर्फ सुख चाहते है और दुख से बचने का प्रयास करते हैं। किंतु सच्चाई यही है कि दुख से ही हमारे आत्मबल, धैर्य, विवेक और जीवटता की असली परीक्षा होती है। दुख से ही हमें अपने और पराए की पहचान होती है। हमें आत्मनिरीक्षण और गलतियों को दूर करने का महत्वपूर्ण सबक मिलता है।
अंतत: यही कहा जा सकता है कि सुख-दुख तो आते रहेंगे। समझदारी इसी में सुख से ज्यादा मोह ना करें और दुख का स्वागत करें। दुख से बचने का कोई रास्ता नहीं है, लेकिन हां भगवान की भक्ति से उसका प्रभाव कम जरूर किया जा सकता है।

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