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अच्छे मित्रों को कभी धोखा ना दें...

एक मस्त-मौला बंदर था जो कि किसी नदी के किनारे फलदार वृक्षों पर रहता था। दिनभर पेड़ों पर मस्ती करता और वहीं से फल तोड़कर खाता और अपने उदर की पूर्ति करता था। इसी तरह उसका जीवन चल रहा था। एक दिन वह वृक्ष पर बैठा फल खा रहा था तभी एक मगरमच्छ किनारे पर आया और वह इधर-उधर ललचाई नजरों से देखने लगा। उसकी हालत देखकर सहसा ही अंदाजा हो रहा था कि वह बहुत भुखा और व्याकुल है।
बंदर उसे देख रहा था, मगरमच्छ की यह हालत देखकर बंदर के मन में उसके लिए दया की भावना जाग गई और उसने मगरमच्छ से पूछा क्या हुआ भाई? इतने परेशान क्यूं हो? मगरमच्छ ने जवाब दिया बहुत दिनों से भुखा हूं कोई शिकार नहीं मिला, इसी वजह से परेशान हूं। बंदर को दया आई और उसने कुछ फल तोड़कर उसकी ओर फेंक दिए, मगरमच्छ को रसदार और स्वादिष्ट फल खा कर आनंद की अनुभूति हुई। उसे खुश देखकर बंदर ने कुछ और फल उसे दे दिए। इसी तरह वह दिन बीत गया। अगले फिर मगरमच्छ बंदर के पास आ गया और बंदर ने उसे फल खिलाए। अब उनकी दोस्ती गहरी होती गई। रोज शाम को मगरमच्छ कुछ फल अपनी पत्नी के लिए भी ले जाने लगा। मगरमच्छ की पत्नी ने पूछा आप रोज-रोज इतने फल कहां से लाते हैं? इस पर बंदर से दोस्ती की पूरी बात उसने कह सुनाई। ऐसे ही दिन बितने लगे।
मगरमच्छ की पत्नी से हृदय से दुष्ट थी इसी दुष्टता के चलते एक दिन उसके मन में ख्याल आया कि जो बंदर इतने स्वादिष्ट और मीठे फल खाता है उसका हृदय कितना मीठा होगा, उसे खाने और ज्यादा मजा आएगा। बस फिर क्या था उसने जैसे-तैसे मगरमच्छ को मना लिया कि वह बंदर का दिल लेकर आए। शुरू में मगरमच्छ दोस्त के साथ धोखा करने से मना करता रहा परंतु अंतत: पत्नी की बात उसे माननी पड़ी।
मगरमच्छ ने योजना बनाकर बंदर से कहा कि मेरी पत्नी को रोज तुम्हारे दिए हुए फल खिलाता हूं जिससे वह अतिप्रसन्न है और तुमसे मिलना चाहती है। बंदर भी खुश हुआ और ठीक है परंतु मैं चलुंगा कैसे? मुझे तैरना नहीं आता। मगरमच्छ ने कहा तुम मेरी पीठ पर बैठ जाओ। बंदर तुरंत ही उसकी पीठ पर बैठ गया। रास्ते में बहुत तेजी से तैर रहे मगरमच्छ से उसने कहा धीरे चलो भाई, मुझे डर लग रहा है। यह सुनकर मगरमच्छ ने कहा अब तो तुझे मरना ही है और मगरमच्छ ने उसकी पत्नी की इच्छा बताई कि उसे तुम्हारा दिल खाना है। यह सुनकर बंदर हतप्रभ रह गया। परंतु उसने धैर्य से बुद्धि का प्रयोग करते हुए कहा अरे भाई पहले बताना था ना मैं तो मेरा दिल पेड़ पर ही छोड़ आया हूं। पहले बताते तो साथ लेकर आते। यह बात सुनकर मगरमच्छ तुरंत ही वापस पेड़ की ओर चल दिया। जैसे पेड़ के करीब पहुंचे वैसे ही तुरंत बंदर पेड़ चल गया और बोला मूर्ख क्या कभी कोई अपना हृदय बाहर छोड़ सकता है। तूने दोस्ती के नाम को बदनाम कर दिया अब जा मर मैं तो चला। मगरमच्छ को खाली हाथ मुंह लटकाकर लौटना पड़ा।
इस कहानी का सबक यही है कि विपरित परिस्थितियों में हमें सावधानी और बुद्धि से काम लेना चाहिए। साथ ही किसी दुष्ट की बातों में आकर अच्छे मित्रों से धोखा नहीं करना चाहिए।

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