सीधे मुख्य सामग्री पर जाएं

बिच्छु का स्वभाव है डंक मारना और हमारा...?

परमात्मा ने सभी जीवों को अपना अलग-अलग स्वभाव दिया है। सभी प्राणी उसी स्वभाव के अनुसार जीवन जीते हैं। जैसे बिच्छु का स्वभाव होता है डंक मारना। ऐसी ही एक कथा है:
एक ज्ञानी और तपस्वी संत थे। दूसरों के दुख दूर करने में उन्हें परम आनंद प्राप्त होता था। एक बार वे सरोवर के किनारे ध्यान में बैठे हुए थे। तभी उन्होंने देखा एक बिच्छु पानी में डूब रहा है। वे तुरंत ही उसे बचाने के लिए दौड़ पड़े। उन्होंने जैसे ही बिच्छु को पानी से निकालने के लिए उठाया उसने स्वामीजी को डंक मारना शुरू कर दिया और वह संत के हाथों से छुटकर पुन: पानी में गिर गया। स्वामीजी ने फिर कोशिश परंतु वे जैसे ही उसे उठाते बिच्छु डंक मारने लगता। ऐसा बहुत देर तक चलता रहा, परंतु संत ने भी हार नहीं मानी और अंतत: उन्होंने बिच्छु के प्राण बचा लिए और उसे पानी से बाहर निकाल लिया। वहीं एक अन्य व्यक्ति इस पूरी घटना को ध्यान से देख रहा था। जब संत सरोवर से बाहर आए तब उस व्यक्ति ने पूछा- स्वामीजी मैंने देखा आपने किस तरह जहरीले बिच्छु के प्राण बचाए। बिच्छु को बचाने के लिए अपने प्राण खतरे में डाल दिए। जब वह बार-बार डंक मार रहा था तो फिर आपने उसे क्यों बचाया? इस प्रश्न को सुनकर स्वामीजी मुस्काए और फिर बोले- बिच्छु का स्वभाव है डंक मारना और मनुष्य का स्वभाव है दूसरों की मदद करना। जब बिच्छु नासमझ जीव होते हुए भी अपना डंक मारने का स्वभाव अंत समय तक नहीं छोड़ रहा है तो मैं मनुष्य होते हुए दूसरों की मदद करने का मेरा स्वभाव कैसे छोड़ देता। बिच्छु के डंक मारने से मुझे असनीय पीड़ा हो रही है परंतु उसकी जान बचाकर मुझे जो परम आनंद प्राप्त हुआ उससे मैं बहुत खुश हूं।

टिप्पणियाँ

इस ब्लॉग से लोकप्रिय पोस्ट

प्रभु का सिमरण सबसे ऊंचा

एक चोर था ! बडा शातिर ! सभी जानते थे कि वह चोर है ! उस गांव के तथा आस-पास के गांवों में जितनी भी चोरियां होती थीं सबके लिए वही जिम्मेदार था ! परंतु वह इतनी सफाई से चोरी करता था कि कभी पकडा नही गया ! चोरी करने की सभी बारीकियों से वाकिफ ! वो अपनी पत्नी और इकलौते बेटे के साथ गांव के नज़दीक ही पहाडी पर एक झोंपडी में रहता था ! चोरी का सामान भी वहीं पहाडी में एक गुफा में छिपा कर रखता था जिससे तलाशी की नौबत आने पर भी पकडा न जा सके ! चोरी करते-करते उम्र के आखरी पडाव में आ पहुंचा ! अक्सर बीमार भी रहने लगा था ! उसे आभास होने लगा कि अब उसके जीवन के दिन थोडे ही हैं ! एक दिन उसने अपने बेटे को बुलाकर उसे चोरी के सारे गुर सिखा दिये और जहां पर उसने चोरी का सामान छुपाया था वह जगह भी दिखा दी ! भगवान की ऐसी कुदरत हुई कि कुछ दिनों बाद ही वो चल बसा ! अब मां-बेटे अकेले रह गए ! धीरे-धीरे पिता द्वारा छोडा चोरी का सामान समाप्त होने लगा ! तब बेटे ने अपनी मां से कहा – “मां, मैं कुछ काम करना चाहता हूं ! बताओ कौन सा काम करूं !” “यह भी कोई पूछ्ने की बात है ?” मां ने समझाया -“बेटा तुम्हारे पिता चोरी किया करते थे ...

छठ घाट और पीर की मजार का अनुशासन

अद्भुत दृश्य था। मुंह अंधेरे नहा-धोकर हजारों-लाखों की भीड़ नदी-तालाब-कुओं के पास इक_ी। ओह! कितनी बेसब्री थी उन आंखों में। तीन बजे सुबह से ही सूर्य के उगने की प्रतीक्षा। सड़कों पर कोई झाड़ू लगा रहा है, कोई पानी मार रहा है। इस रास्ते से परवैतिन-व्रती गुजरने वाले हैं। जात-धर्म का कहीं कोई मोल नहीं। गरीब-गुरबों के अधनंगे बच्चे घाटों के किनारे जमा हो गए हैं। आज उन्हें कोई हिकारत से नहीं देख रहा था। दूसरे त्योहार भी होते हैं, ऐसे बिन बुलाए मेहमान आ गए तो तुरत झिड़की। पर, यहां तो आशीष के साथ सबके हाथों में प्रसाद रखा जा रहा है। अद्भुत व्रत छठ का। व्रती के आगे प्रसाद के लिए हाथ फैलाने वाले सबके सब एक रंग में। चाहे कीमती गर्म कपड़ों में लिपटा कोई हो या भूखा-अंधनंगा। व्रती के लिए सब एक समान। जो जैसे आया सबके हाथों में प्रसाद देना ही देना है। न कहीं मारपीट, न तू तू-मैं मैं। कौन-सी शक्ति है यह, जिसने सबको इतना अनुशासित बना दिया। मंदिर-मस्जिद के नाम पर दंगे-फसाद होते रहे हैं। पर, दो जगहों पर अनुशासन का अनूठा रूप देखा है मैंने। एक तो छठ व्रत के समय और दूसरा किसी पीर बाबा की मजार पर। हिंदू हो या मुसल...

रामायण क्या-क्या सिखाती है?

रामायण पौराणिक ग्रंथों में सबसे ज्यादा पढ़ी जाने वाली किताब है। रामायण को केवल एक कथा के रूप में देखना गलत है, यह केवल किसी अवतार या कालखंड की कथा नहीं है, बल्कि यह जीवन जीने का रास्ता बताने वाली सबसे महत्वपूर्ण पुस्तक है। रामायण में सारे रिश्तों पर लिखा गया है, हर रिश्ते की आदर्श स्थितियां, किस परिस्थिति में कैसा व्यवहार करें, विपरित परिस्थिति में कैसे व्यवहार करेंं, ऐसी सारी बातें हैं। जो आज हम अपने जीवन में अपनाकर उसे बेहतर बना सकते हैं। - दशरथ ने अपनी दाढ़ी में सफेद बाल देखकर तत्काल राम को युवराज घोषितकर उन्हें राजा बनाने की घोषणा भी कर दी। हम जीवन में अपनी परिस्थिति, क्षमता और भविष्य को देखकर निर्णय लें। कई लोग अपने पद से इतने मोह में रहते हैं कि क्षमता न होने पर भी उसे छोडऩा नहीं चाहते। - राजा बनने जा रहे राम ने वनवास भी सहर्ष स्वीकार किया। जीवन में जो भी मिले उसे नियति का निर्णय मानकर स्वीकार कर लें। विपरित परिस्थितियों के परे उनमें अपने विकास की संभावनाएं भी तलाशें। परिस्थितियों से घबराएं नहीं। - सीता और लक्ष्मण राम के साथ वनवास में भी रहे, जबकि उनका जाना जरूरी नहीं था। ये हमें...