सीधे मुख्य सामग्री पर जाएं

मोबाईल,कलाकार और रिंगिंग ध्वनी


फुनवा के दिन बीते रे भैया अब मोबाईल आयो रे ,गीत खुशियन का लायो रे .............ओ SओS ओS ओS ओ................ तो जे हैं आज के जुग की सबसे बड़ी ख़बर, कि गाँव गाँव और शहर शहर मा मोबाईल पहुँच गयो हैं ,पानी नही पहुँच पायो ,स्कूल नही आयो ,पहुंचे गयो हैं मोबाईल,ओ ओ काकी .....ओरी ताई जरा सुनियो .......का कहत हैं जे shankar ,का बतावत हैं?नई कहानी ...............न हैं कोई राजा न कोई रानी ,कुछ गीतों कि जुबानी ,कड़वी खट्टी बानी ।


तो सुनिए भाईसाहब,और दीदी जी यह हैं मोबाईल और उसकी रिंगिंग टोन कि कहानी........

पिछले कुछ साल से मोबाईल टेक्नोलोजी में क्रन्तिकारी परिवर्तन हुए हैं ,सुधारनाए हुई हैं,कहाँ तो लोग ऐस. टी. डी. के लिए पब्लिक बूथों पर लम्बी लम्बी लाइन लगाते थे और कहा अब घर घर में फ़ोन हो गया हैं,अजी! घर घर की कहानी क्या सुनानी?वही नाना वही नानी ,यहाँ तो हेर जेब में हर पर्स में फोन हैं यानि आज के युग का सर्वाधिक तीव्र गप्पे मारने का साधन हैं मोबाईल। रोज़ नए नए ढंग के मोबाईल बाज़ार में उतारे जा रहे हैं,गाने वाला मोबाईल,सुनने वाला मोबाईल,फोटो वाला मोबाईल,वीडियो वाला मोबाईल,कम पैसे वाला मोबाईल,ज्यादा पैसे वाला मोबाईल,लड़कियों के लिए सुंदर गुलाबी मोबाईल,तो लड़को के लिए ज्यादा तकनिकी गुणवत्ता वाला मोबाईल,हर शहर कि हर गली में एक मोबाईल स्टोर और हर स्टोर में हजारो तरह के मोबाईल ।
क्या हैं न कि भारतीय जनता आवश्यकता से अधिक संगीत प्रेमी हैं ,इसलिए हर मोबाईल में गाने डाउनलोड करने,भेजने,सुनने सुनाने कि उत्तम वयवस्था ,फ्री रिंग टोन और इस सब में गत बजाने वाले कलाकार कि दुर्गत ।

जी हाँ इस मोबाईल ने जहाँ आम जनता को सुख समुद्र में डुबो रखा हैं वही कलाकारों को आंसू निकालने पर भी मजबूर कर दिया हैं । अब मेरी ही बात लीजिये ,२ साल पहले मुंबई में एक काफी बड़े कार्यक्रम में, काफी बड़े हॉल में वीणा वादन की प्रस्तुति दे रहI थI , मेरा और सभी श्रोताओ का मन वीणा की सुरील लहरियों में खो चुका था की अचानक किसी का मोबाईल बजा ........... मुन्ना भाई MBBS,मुन्ना भाई .................

एक अन्य कलाकार के साथ तो इससे भी बुरा हुआ ,ख्याल गायन चल रहा था ,बोल थे
"आज आनंद ही आनंद गोकुल में ,आज आनंद ही आनंद" ,श्रोता भी आनंद से विभोर हो रहे थे,एक महिला का मोबाईल बजा .....आ सोचा तो आंसू भर आए मुद्दते हो गई मुस्कुराये ...........

एक संगीत विद्यालय का गुरुपूर्णिमा उत्सव चल रहा था ,गुरु जी गा रही थी ,गुनियन की सुनो गुनियन की मानो ,जो माने गुनियन की सो सब सुख पावे ,एक विद्यार्थी का मोबाईल बजा ............ऐसी की तेसी क्या कर लेगा जमाना .............


एक संगीतकार राग दीपक में गा रहे थे "धरती जले अम्बर जल रहा" ....किसी का मोबाईल बजा ............. "रिमझिम रिमझिम बरसे बदरिया आज मोरे अंगना .."

अजी यह भी सह लिया लेकिन कुछ लोगो के मोबाईल की रिंगिंग टोन तो इतनी अजीब अजीब किस्म की होती हैं की क्या कहिये ,अब सुनिए जब एक रिंगिंग टोन की वजह से मेरा हार्टअटेक होते होते रह गया । हुआ यूँ की मैं बजा रही थI कोमल स्वभाव वाला राग बिहाग,सब सुनने में मगन ,एकदम पिन ड्राप साइलेंस था,बस मेरी वीणा के स्वर गूंज रहे थे,अचानक ऐसी भयंकर आवाज आई मानों सौ-सौ पहाड़ एक साथ गिर गए हो ,भूकंप आ गया हो.मेरा दिमाग हिल गया ,हाथ से शालिग्राम शिला (जिससे मैं वीणा बजाती हूँ)उछली और सीधे पब्लिक के पास जा गिरी,मेरे होश फाख्ता!१ मीनट बाद मैं और श्रोता दोनों को समझ आया की आख़िर हुआ क्या हैं? दरसल एक महाशय का मोबाईल बजा ,रिंगिंग टोन थी - एक दैत्य की हँसी -जी यह उस रिंगिंग टोन का नाम था ,और उसमे बिठायी गई थी,डरावनी,जोरदार,भयंकर हँसी,वो भी पुरी आवाज में .........महाशय को झिड़का ,हॉल से बाहर जाने का निर्देश दिया,दिमाग को शांत किया फ़िर कही जाकर वीणा वादन शुरू हुआ .

तो ऐसी बुरी अवस्था कर डाली हैं इस मोबाईल ने हम कलाकारों की क्या कहियेगा की हमे अब गाने वाले मोबाइलों से डर लगने लगा हैं जी,लोगो को एक पल भी मोबाईल के बिना जी लगता नही और मोबाईल अगर बज जाए तो हमसे कुछ बजता नही ।

टिप्पणियाँ

इस ब्लॉग से लोकप्रिय पोस्ट

अपने ईगो को रखें पीछे तो जिदंगी होगी आसान

आधुनिक युग में मैं(अहम) का चलन कुछ ज्यादा ही चरम पर है विशेषकर युवा पीढ़ी इस मैं पर ज्यादा ही विश्वास करने लगी है आज का युवा सोचता है कि जो कुछ है केवल वही है उससे अच्छा कोई नहीं आज आदमी का ईगो इतना सर चढ़कर बोलने लगा है कि कोई भी किसी को अपने से बेहतर देखना पसंद नहीं करता चाहे वह दोस्त हो, रिश्तेदार हो या कोई बिजनेस पार्टनर या फिर कोई भी अपना ही क्यों न हों। आज तेजी से टूटते हुऐ पारिवारिक रिश्तों का एक कारण अहम भवना भी है। एक बढ़ई बड़ी ही सुन्दर वस्तुएं बनाया करता था वे वस्तुएं इतनी सुन्दर लगती थी कि मानो स्वयं भगवान ने उन्हैं बनाया हो। एक दिन एक राजा ने बढ़ई को अपने पास बुलाकर पूछा कि तुम्हारी कला में तो जैसे कोई माया छुपी हुई है तुम इतनी सुन्दर चीजें कैसे बना लेते हो। तब बढ़ई बोला महाराज माया वाया कुछ नहीं बस एक छोटी सी बात है मैं जो भी बनाता हूं उसे बनाते समय अपने मैं यानि अहम को मिटा देता हूं अपने मन को शान्त रखता हूं उस चीज से होने वाले फयदे नुकसान और कमाई सब भूल जाता हूं इस काम से मिलने वाली प्रसिद्धि के बारे में भी नहीं सोचता मैं अपने आप को पूरी तरह से अपनी कला को समर्पित कर द...

प्रभु का सिमरण सबसे ऊंचा

एक चोर था ! बडा शातिर ! सभी जानते थे कि वह चोर है ! उस गांव के तथा आस-पास के गांवों में जितनी भी चोरियां होती थीं सबके लिए वही जिम्मेदार था ! परंतु वह इतनी सफाई से चोरी करता था कि कभी पकडा नही गया ! चोरी करने की सभी बारीकियों से वाकिफ ! वो अपनी पत्नी और इकलौते बेटे के साथ गांव के नज़दीक ही पहाडी पर एक झोंपडी में रहता था ! चोरी का सामान भी वहीं पहाडी में एक गुफा में छिपा कर रखता था जिससे तलाशी की नौबत आने पर भी पकडा न जा सके ! चोरी करते-करते उम्र के आखरी पडाव में आ पहुंचा ! अक्सर बीमार भी रहने लगा था ! उसे आभास होने लगा कि अब उसके जीवन के दिन थोडे ही हैं ! एक दिन उसने अपने बेटे को बुलाकर उसे चोरी के सारे गुर सिखा दिये और जहां पर उसने चोरी का सामान छुपाया था वह जगह भी दिखा दी ! भगवान की ऐसी कुदरत हुई कि कुछ दिनों बाद ही वो चल बसा ! अब मां-बेटे अकेले रह गए ! धीरे-धीरे पिता द्वारा छोडा चोरी का सामान समाप्त होने लगा ! तब बेटे ने अपनी मां से कहा – “मां, मैं कुछ काम करना चाहता हूं ! बताओ कौन सा काम करूं !” “यह भी कोई पूछ्ने की बात है ?” मां ने समझाया -“बेटा तुम्हारे पिता चोरी किया करते थे ...

छठ घाट और पीर की मजार का अनुशासन

अद्भुत दृश्य था। मुंह अंधेरे नहा-धोकर हजारों-लाखों की भीड़ नदी-तालाब-कुओं के पास इक_ी। ओह! कितनी बेसब्री थी उन आंखों में। तीन बजे सुबह से ही सूर्य के उगने की प्रतीक्षा। सड़कों पर कोई झाड़ू लगा रहा है, कोई पानी मार रहा है। इस रास्ते से परवैतिन-व्रती गुजरने वाले हैं। जात-धर्म का कहीं कोई मोल नहीं। गरीब-गुरबों के अधनंगे बच्चे घाटों के किनारे जमा हो गए हैं। आज उन्हें कोई हिकारत से नहीं देख रहा था। दूसरे त्योहार भी होते हैं, ऐसे बिन बुलाए मेहमान आ गए तो तुरत झिड़की। पर, यहां तो आशीष के साथ सबके हाथों में प्रसाद रखा जा रहा है। अद्भुत व्रत छठ का। व्रती के आगे प्रसाद के लिए हाथ फैलाने वाले सबके सब एक रंग में। चाहे कीमती गर्म कपड़ों में लिपटा कोई हो या भूखा-अंधनंगा। व्रती के लिए सब एक समान। जो जैसे आया सबके हाथों में प्रसाद देना ही देना है। न कहीं मारपीट, न तू तू-मैं मैं। कौन-सी शक्ति है यह, जिसने सबको इतना अनुशासित बना दिया। मंदिर-मस्जिद के नाम पर दंगे-फसाद होते रहे हैं। पर, दो जगहों पर अनुशासन का अनूठा रूप देखा है मैंने। एक तो छठ व्रत के समय और दूसरा किसी पीर बाबा की मजार पर। हिंदू हो या मुसल...