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ना आना इस देश लाडो...

एक हफ्ते से घरों में नवरात्र की पूजा चल रही है। अष्टमी का बेसब्री से इंतजार है और आज अष्टमी भी आ गई। परंपराओं के अनुसार आज घर-घर में कन्याओं का पूजन होगा। इसके लिए कन्याओं की एडवांस बुकिंग हो चुकी है। शायद इस बार ढूंढने से आपको पूजने के लिए कन्याएं जरूर मिल जाएंगी, लेकिन आगे ऐसा आसानी से हो पाएगा कहना मुश्किल है। देश के कई हिस्सों में पहले ही हजार पुरुषों पर महिलाओं की संख्या 887-900 के खतरनाक स्तर तक आ गई है। देश के तमाम प्राइवेट हॉस्पिटल और घर पर होने वाली डिलीवरी के आंकड़ों को जोड़ लें तो यह अंतर कहीं ज्यादा नजर आएगा। एक तरफ कन्याओं को पूजने और दूसरे तरफ कोख में ही मिटा देने के दुष्चक्र की कहानी भी अजीब है। ये समाज का कौन सा चेहरा है जो एक तरफ साल में दो बार बेटियों की पूजा करता है, दूसरी तरफ अपने घर में बेटियों की किलकारी से उतना ही परहेज रखता है। नवरात्र के पवित्र दिनों में लोग दुर्गा की पूजा तो करते रहे, लेकिन दुर्गा रूप की आवाज इन दिनों में कमजोर से कमजोर होती गई। इस दौरान लड़कियों की मुकाबले लड़कों की पैदाईश ज्यादा हुई। रूठ रही है नन्ही देवियां नन्ही देवियां अब रूठ रही हैं। कहीं जन...

रामलीला की अनोखी लीलाएँ

एक बार रामलीला मंच पर सीता स्वंयवर का दृश्य चल रहा था। बीच में भगवन शंकर का धनुष रखा हुआ था। सभी राजा उसे उठाने में असफल होने का अभिनय कर रहे थे। दरबार में उपस्थित रावण को भी इसी प्रकार अभिनय करना था। मगर उस दिन किसी बात पर उसका रामलीला के प्रबंधक से झगडा हो गया था, इसलिए वह रामलीला को बिगाड़ने पर तुला हुआ था। उसने धनुष को एक झटके में उठाकर तोड़ डाला और जोर से हुनकर लगे - अरे जनक, मैंने इस धनुष को तोड़ दिया। बुला अपनी सीता को। करा उससे मेरा विवाह। मंच पर उपस्थित सभी कलाकार आश्चर्यचकित रह गए। अ़ब क्या हो? तभी जनक का अभिनय करने वाले कलाकार को कुछ सूझा। उसने अपने दरबारियों की ओर देखते हुए कहा - अरे मूर्खों, तुम यह कौन सी धनुष ले आए। असली शिव धनुष तो अंदर ही रखा हुआ है। उसे लेकर आओ। इसके बाद परदा गिरा दिया गया ओर तब कहीं जाकर स्थिति संभली। एक कसबे की रामलीला में तो इससे भी रोचक घटना घटी। लक्ष्मण मूर्छा के प्रसंग में भगवन राम मूर्छित लक्ष्मण को अपनी गोद में लिटाये विलाप कर रहे थे। हनुमान जडी-बूटी लेने गए हुए थे । उनके आने में विलंब हो रहा था। राम बने कलाकार ने अपने सम्पूर्ण संवाद पुरे कर लिए।...

कन्या को पूजने का पर्व है नवरात्र

भारतीय ज्योतिष शास्त्र के अनुसार नक्षत्रों की गणना आश्विन नक्षत्र से आरंभ होती है। इस आधार पर आश्विन मास ज्योतिष वर्ष का प्रथम मास माना जाता है। दूसरी ओर सामान्य जन के लिए हिंदू कैलेंडर में संवत्सर या नए साल की शुरुआत चैत्र मास से होती है। इस प्रकार चैत्र नवरात्र की तरह आश्विन नवरात्र के साथ भी नवीन समय के शुभारंभ की भावना जुड़ी हुई है। चैत्र ओर आश्विन - इन दोनों के नवरात्र ऋतुओं के संधिकाल में पड़ते है। संधिकाल के समय देवी की उपासना का विशेष महत्व है। जिस प्रकार देवी ने प्रकट होकर अनेक राक्षसों का वध किया, उसी प्रकार शक्ति की पूजा-उपासना से ऋतुओं के संधिकाल में होने वाले रोग-व्याधियों पर मनुष्य विजय प्राप्त करता है। यही नवरात्र का वैज्ञानिक महत्व है। इन दोनों ऋतू संधिकाल के नौ-नौ दिनों (दोनों नवरात्र ) को विशिष्ट पूजा के लिए महत्वपूर्ण माना गया है। जैसा किहम जनते है, इस अवधि में हम खान-पान और आचार-व्यव्हार में यथासंभव संयम और अनुशासन का पालन करते है। नवरात्र पर्व के साथ दुर्गावतरण कि कथा तथा कन्या -पूजा का विधान जुदा हुआ है। यह उसका धार्मिक और सामाजिक पक्ष है। हमारे शास्त्रों में बालि...

कभी घी घना, कभी मुट्ठी भर चना

पिछले कुछ समय से मंदी की मार से पुरा विश्व त्रस्त है। भारत में भी इसकी तकलीफ महसूस की जा रही है। इसके कारन आत्महत्याएं भी हो रही है। कई परिवार उजड़ गए है। क्या यह मंदी इतनी बेबस और लाचार कर देने वाली है की मानव अपनी ही जन का दुश्मन बन जाए? की इस प्रकृति के साधारण जीवों से भी गया-गुजरा हो जाए? इस संसार में दुसरे प्राणियों का और कोई ऐसा उदाहरण नहीं मिलता जिसमें किसी जीव ने दुखी हो कर खुदकुशी कल ली हो- सिवाय मनुष्य के। चावार्क का एक सूत्र है कि जब तक जिएँ सुख से जिएँ, इसके लिए चाहे ऋण लेकर घी पिएँ। इस नाशवान देह के मरने के बाद पुनर्जन्म किसने देखा। वह चावार्क भी यदि आज जिन्दा होते तो शायद वे भी इस मंदी की मार से बच नहीं पाते। शायद सोचते की काश मैं लोगों को कर्ज लेने के लिए नहीं उकसाता। कर्ज ले कर हसीं जिन्दगी जीने का ख्वाब ही अ़ब कई लोगों को अर्श से फर्श पर ले आया है। ऐसे में डिप्रेशन में आ जाना तो सामान्य बात है। परन्तु इसका समाधान आत्महत्या तो कदापि नहीं हो सकता। गीता में मोह के कारन अवसाद ग्रस्त अरुजुन को भगवन कृष्ण समझाते है कि जिसका जन्म हुआ है, उसकी मृत्यु निश्चित है अरु जिसकी मृत्...

कभी घी घना, कभी मुट्ठी भर चना

पिछले कुछ समय से मंदी की मार से पुरा विश्व त्रस्त है । भारत में भी इसकी तकलीफ महसूस की जा रही है । इसके कारन आत्महत्याएँ भी हो रही है । कई परिवार उजड़ गए है । क्या यह मंदी इतनी बेबस और लाचार कर देने वाली है की मानव अपनी ही जान का दुश्मन बन जाए ? की इस प्रकृति के साधारण जीवों से भी गया - गुजरा हो जाए ? इस संसार में दुसरे प्राणियों का और कोई ऐसा उदहारण नहीं मिलता जिसमें किसी जीव ने दुखी होकर खुदकुशी कर ली हो - सिवाय मनुष्य के । चावार्क का एक सूत्र है किजब तक जिएँ सुख से जिएँ , इसके लिए चाहे ऋण लेकर घी पिएँ । इस नाशवान देह के मरने के बाद पुनर्जन्म किसने देखा । वह चावार्क भी यदि आज जिन्दा होते तो शायद वे भी इस मंदी की मार से बच नहीं पते । शायद सोचते की काश मैं लोगों को कर्ज लेने के लिए नहीं उकसाता । कर्ज लेकर हसीन जिन्दगी जीने का ख्वाब ही अ़ब कई लोगों को अर्श से फर्श पे ले आया है । ऐसे में डिप्रेशन में आ जाना तो सामान्य बात ह...

दूसरों से प्रभावित न होना ही वैराग्य है

इस जगत की हर वास्तु के साथ भय जुड़ा है। जिनके पास बहुत अधिक धन है, व्यवसाय अच्छा चल रहा है, उन्हें व्यवसाय में क्षति की आशंका रहती है। जो किसी स्पोर्ट्स में चैम्पियन है, उन्हें चैम्पियनशिप छीन जाने का कर लगा रहता है। इस धरती पर ऐसी कोई चीज नहीं जिसमे डर न हो। शास्त्रों में कहा गया है की केवल एक वास्तु है, जिसमें डर नहीं समाया होता - वह है वैराग्य। केवल वैराग्य में ही भय नहीं है। लेकिन वैराग्य है क्या? वैराग्य का अर्थ है किसी वास्तु के रंग में अपने मन को रंगने न देना। जगत में जो भी वस्तुएं है, मनुष्य कभी जानबूझकर और कभी अनजाने में उनकी ओर आकृष्ट होता है। हर चीज का अपना रंग है, अपना प्रभाव है। जब मनुष्य मन को इतना मजबूत बना ले की वह किसी भी रंग से प्रभावित नहीं हो, तब उस अवस्था को वैराग्य कहते है। वैराग्य का अर्थ सब कुछ छोड़कर भागना नहीं है। 'वैराग्य' का अर्थ पलायन नहीं है, वह दूसरे के द्वारा प्रभावित न होना है। कीचड़ में पैदा होने वाला कमल कीचड़ में रहता है, परन्तु फिरभी उसकी पंखुडियों पर कीचड़ नहीं लगता। इसी अवस्था को कह्नते है वैराग्य। इस वैराग्य की अवस्था में मनुष्य कब प्रतिष्...